जमाल-ए-आलम

अभी काफी बार गिरना बाकी है

अभी काफी बार डगमगाना बाकी है

हक़ीक़त से वाकिफ हूं मेरे ख़ुदा

मगर हौसला अभी भी बाकी है

जब तक आफताब की किरणे मुझसे मायूस नहीं होती

जब तक हवाएं मुझसे अफ्रार – ए – ज़िक्र नहीं करलेती

अभी भी जीने की जुस्तजू बाकी है

काश कोई पैगाम ले आये तो कहदे हम उसे

जब तक मोहब्बत हसीन सलीके से भरपूर

असलियत है मुजमे अभी भी ये अदा बाकी है

जब तक ये शब में लपेटे हुए सुकून के ख़्वाब हैं जाना

हमारी रूह की मुसर्रत अभी भी बाकी है ।।

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